मुंबई जिसे जाना जाता रहा है...चमक दमक भरी ज़िंदगी के लिए....मुंबई जिसे जाना जाता है....कुछ खोने के लिए...कुछ पाने के लिए...वो मुंबई जिसे जाना जाता है....फैशन और सेलिब्रेशन के लिए....वो मुंबई जिसके साथ जुड़ा है गौरवशाली मराठा अतीत....बांबे से मुंबई तक का सफर तय करते-करते आज इसका वजूद खतरे में नजर आने लगा है....कल और आज का फर्क इस महानगर से बेहतर कोई नहीं बता सकता...बदलते दौर की परिभाषा मुंबई से बेहतर कोई नहीं समझा सकता....नैतिक और अनैतिक का फर्क मुंबई से बेहतर कोई नहीं जाहिर कर सकता....
चांदी के सिक्कों की खनक....तेज रफ्तार जिंदगी....और हर दिल में बसी चांद पर घर बसाने की तमन्ना...मुंबई की पहचान है....लेकिन आज इसको लेकर तरह-तरह की बातें की जाने लगी हैं....जहां से वास्ता है...करोड़ों की आबादी का....जिसे हासिल है देश की आर्थिक राजधानी का खिताब....उस पर अवाम का हक है...या नहीं....चंद लोग इसका फैसला करने के लिए न्यायधीश की भूमिका निभाने लगे हैं....पता नहीं ये हक उनको किसने दिया....अवाम ने...या संविधान ने....इसकी फिक्र भी उन्हें नहीं...बात अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने जैसी है....संवैधानिक व्यवस्था के तहत....उनका न्यायधीश बनना जायज नहीं ठहराया जा सकता.....मुंबईकर खुश हैं....उन्हें कतई इस बात की फिक्र नहीं...कि कौन मुंबई में आ रहा है....और कौन मुंबई से बाहर जा रहा है....वे मुंबई को आज भी देश का एक हिस्सा मानते हैं....लेकिन उनकी खुशी के लिए जबरिया फिक्रमंद हैं...वो लोग जिन्हें एक मुद्दा चाहिए...अपना सियासी वजूद कायम रखने के लिए.....मुंबई महंगाई की मार से बेहाल है....उनका मुद्दा ये नहीं....मुंबई आतंकवाद से परेशान है.....उनका मुद्दा ये नहीं....उनका मुद्दा सबसे जुदा है.....वे परेशान हैं....इस सवाल को लेकर ...कि आखिर मुंबई किसकी......हर दिन एक नया बयान....हर दिन एक नया विवाद.....हर दिन तुगलकी फरमान...मुंबईकर भी परेशान है.....उन्हें फिक्र है रोजाना रोटी जुटाने की....उनके लिए उत्तरभारतीय...या दक्षिण भारतीय कोई नहीं.....वे खुद को हिंदुस्तानी करार देते हैं....
पहले तो मामला पेचीदा नजर आ रहा था...लेकिन धीरे-धीरे ये मजाक सरीखा लगने लगा है....चंद लोगों की इस जमात को अपराधिक घटनाएं अंजाम देने से भी गुरेज नहीं....ये भयावह जरूर है....हालांकि इस पूरे मामले में एक बात उभर कर सामने आई है....वो ये कि सारा खेल सियासी है....कसूरवार सिर्फ मुंबई की जमीन पर सियासी रोटी सेकने की खास मकसद को लेकर हंगामा मचाने वाले लोग ही नहीं....कसूर उनका भी है...जो सियासी वजहों से उनकी हरकतों को नजरंदाज कर देते हैं.....जिससे उनका मनोबल ऊंचा होता है....सवाल सिर्फ मराठी वोट बैंक का है...उनके लिए भी....जो हंगामा बरपा रहे हैं...और उनके लिए भी जो पूरे मसले पर चुप्पी साध लेते हैं....
मराठी मानुष की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले कई मौके पर साबित कर चुके हैं....कि उन्हें संविधान से मतलब नहीं....उन्हें कानून में आस्था नहीं...वे मुंबई का तालिबानीकरण चाहते हैं....बड़ा सवाल ये है...कि आखिर उनमें और 26/11 के आतंकियों में क्या फर्क है...उनका भी मकसद है.....दुनिया का इस्लामीकरण....जिसके लिए वे अपने तरीके से लड़ाई लड़ते हैं...दहशत का खेल खेलते है....ठीक उसी तरह जैसे मराठी मानुष के हक की बात कर...मुंबई में उत्तरभारतीयों को पीटा जाता है...दहशत का खेल खेला जाता है....वे भी भारतीय संविधान और कानून से वास्ता नहीं रखते...ऐसे में वे अपराधी हैं...तो खुद के फायदे की तलाश में मुंबई की सड़कों पर कानून का मजाक उड़ाने वाले महाराष्ट्र के कथित हितचिंतक क्यों नहीं....सवाल एक नहीं कई हैं.....आखिर इस पूरे खेल का अंजाम क्या होगा...कब तक चलेगा ऐसा....देश की सेना सीमा पर भारत माता की जयघोष करते हुए दुश्मनों के छक्के छुड़ा देती है....लेकिन सियासतदानों की ये सियासी सेना कब तक अपने ही देश के लोगों का हांथ पांव तोड़ने का काम करेगी...और कब तक ये सेनानायक जबरियामुंबई में रहने वालों की तकदीर का फैसला करेंगे....
शरदिंदु...............
शनिवार, 6 फ़रवरी 2010
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