सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

मीडिया

बचपन में चंदा मामा की कहानियां...मां गोद में लोरी...और जवानी में अनगिनत ख्वाब.....वक्त गुजरता गया...और आहिस्ता-आहिस्ता बात आ पहुंची हकीकत और ख्वाब के बीच का फर्क जानने समझने तक....होश संभालने के साथ ही टेलीविजन से रू-ब-रू हुआ...याद है वो दिन जब रामायण देखने के लिए घर के सारे काम काज ठप हो जाते थे....और तो और घर सिनेमा हॉल में बदल जाता था....पड़ोस के तमाम लोग अपना काम-काज छोड़ कर जुट जाते थे....बोलती तस्वीरों के सहारे रामायण की रोचक गाथा की जानकारी लेने के लिए.....उस वक्त राम कथा से किसी की आस्था जुड़ाव भले ही हो...मेरे लिए वो पल बेहद मनोरंजक था....तीर-धनुष के साथ राम लक्ष्मण और हनुमान की बहादुरी....राक्षसों के साथ लड़ाई...सनसनाते तीर....और वैसे अनेक नजारे....जो हकीकत से परे हों...खैर टीवी से दोस्ती की शुरुआत कुछ इसी तरह हुई....कुछ समय गुजरने के बाद मनोरंजन के साथ ही ख़बरों के लिए भी टीवी बेहतर जरिया साबित होने लगा....उस समय न्यूज रीडर को न्यूज पढ़ते या फिर रिपोर्टर को अपनी बात कहते देख कर बरबस ही जेहन में ख्याल उमड़ने लगता....काश एक दिन हम भी ऐसा कर पाते.....वक्त ने उस ख्याल और हकीकत के बीच का फासला मिटा दिया...और एक दिन हमने भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दामन थाम लिया....बतौर खबरनवीस सफऱ की शुरुआत हुई.....चांद पाने की तमन्ना दिल में बसी हो....और अरमान पूरा हो जाए...तो खुशी का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है....चंद साल ठीक गुजरे...लेकिन उसके बाद सामने आया.....एक ऐसा सच...जिसने जेहन में मौजूद आइडियल जर्नलिज्म की परत को खुरचना शुरू कर दिया.....नैतिकता की दुहाई देकर पत्रकारिता की बात करने वाले संस्थान ने निर्देश दिए....कि जनसेवा से काम नहीं चलने वाला अब मेवा का भी इंतजाम करो....इस फरमान को लोग नजरंदाज नहीं करें....इसके लिए एक बैठक बुलाई गई....जिसमें चैनल समूह के तत्कालीन मुखिया और आइडियल समझे जाने वाले शख्स,कुनबे के तमाम सदस्यों से मुखातिब हुए....उन्होंने अपनी बात रखी...तो रही सही कसर भी पूरी हो गई.....उन्होंने कहा....कि गाड़ी चलाने के लिए फ्यूल की जरूरत होती है...और चैनल चलाने के लिए पैसे की.....हमे इससे मतलब नहीं....कि राजस्व कहां से आएगा....ये आपको तय करना है...हां एक बात तय है...कि जो राजस्व का इंतजाम नहीं कर पाएगा....उसे हम साथ लेकर चलने में सक्षम नहीं हैं.....खैर उगाही कहें...या विज्ञापन या उसे राजस्व का नाम दें.....रिपोर्टर नेताओं का दरवाजा खटखटाने लगे.....विज्ञापन के नाम पर बाहुबलियों को समाजसेवी बनाया जाने लगा....और दुकानदारी होने लगी....उस वक्त पहली बार अफसोस हुआ...मीडियापर्सन बन कर जिंदगी गुजारने के फैसले पर....आंखों के सामने तैरने लगे वो पल...जब किसी एंकर और रिपोर्टर को देख कर हम खुश होते थे....और सोचते थे....कि काश उसकी जगह हम मौजूद होते.....खैर सीधे तौर पर इसे भी स्वीकारना होगा....कि स्वार्थ या मजबूरियों के तहत हमने कुछ समय तक चैनल के प्रोडक्ट को बेचने का काम किया.....ये वो दौर था...जब हमने कई  दरवाजे खटखटाए....जहां विज्ञापन एजेंट नहीं सिर्फ खबरनवीस की जरूरत हो....लेकिन हर दरवाजा बंद मिला.....हां कभी कभी मीडिया के बदलते ट्रेंड का हवाला देकर... संस्थान की नीतियों को साथ लेकर चलने की सलाह जरूर मिल जाती थी....हालांकि अब उन सलाहकारों की याद जरूर आती है...यकीनन वे दूर की सोचने वाले थे और आने वाले कल की बेहतर जानकारी रखते थे....रीजनल चैनल के नाम पर अनगिनत दुकानें खुल चुकी हैं.....जहां पत्रकारिता के नाम पर खबर बिक रही है....कभी जिस मीडिया को सामाजिक सरोकार की बदौलत तरजीह दी जाती थी....आज उसे लेकर तरह तरह की बातें की जाने लगी हैं.....पत्रकार पीटे जा रहे हैं...जेल जा रहे हैं....भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले....भ्रष्टाचार की पोल खोलने वाले.....खुद सवालों के घेरे में नजर आने लगे हैं.....और कभी वसूली को लेकर..तो कभी शोषण को लेकर....कभी किसी दागदार दामन वाले की संगत को लेकर खबरों की सुर्खियां बनने लगे हैं....हालांकि उम्मीद की लौ जल रही है....एक कुदरती फलसफे के साथ.....कि बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त भी आता है........हालात बदलेंगे.......................