सोमवार, 1 मार्च 2010
इंतजार की हद...
मसला बेहद खास है...बातचीत जरूरी है...अमेरिकी आका भी ऐसा ही चाहते हैं...और इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर अपनी उदार छवि को कायम रखने की मजबूरी भी सामने है...तो अब पड़ोसी मुल्क के तमाम कारनामों को भुला कर लंबे अरसे बाद दोबारा बातचीत की शुरुआत करनी ही पड़ी...इधर से निरुपमा राव तो उधर से सलमान बशीर साहब...नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में दोनों ने हाथ मिलाए...खैर हाथ मिलाना ही मकसद भी था...ये तो सभी को मालूम था...कि वार्ता का नतीजा क्या सामने आने वाला है...यूं भी अधिकारिक तौर पर विदेश राज्य मंत्री ने साफ कर दिया था...कि इस बातचीत से ज्यादा उम्मीद रखने की जरूरत नहीं...खैर हम भारतवासी हैं....धैर्य और उदारता के लिए ही जाने जाते हैं...पाकिस्तान जैसे नापाक मंसूबे पाल नहीं सकते...चीन जैसे खतरनाक इरादे हमारे हो नहीं सकते....लेकिन खतरनाक और नापाक से परे हट कर हम तो अपना बचाव भी नहीं कर सकते...एक बार फिर हमने ऐसा ही साबित किया...जब सलमान बशीर ने मीडिया के सामने इस बातचीत की औकात जाहिर कर दी...और कहा...कि आतंकवाद को लेकर भारत ने जो सबूत सौंपे हैं....वे किसी काम के नहीं...कहानी की तरह है...इससे बड़ा मजाक भला और क्या हो सकता है? लेकिन भारत के हुक्मरानों को इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं...इतना ही सुनने के लिए तो 26/11 के बाद से बातचीत बंद की थी....लंबे चौड़े दावे किए जा रहे थे...कि हम बात उसी शर्त पर करेंगे...कि पाक आतंकियों पर कार्रवाई करे...इस बयान का क्या हुआ....पता ही नहीं चला....हमने ना सिर्फ पाक के साथ अधिकारिक तौर पर बातचीत की शुरुआत की....बल्कि एक बार फिर पाक का एक नुमाइंदा मजाक उड़ा कर चला गया....उसके जाने के बाद चंद दिन भी नहीं गुजरे...जिस दिन पूरा भारत रंगों का त्योहार मना रहा था...पाकिस्तान की जमीन से कोलकाता के कारोबारियों से करोड़ों रुपए रंगदारी की मांग की गई...आतंकी मौजूद है...पाक को इसका सबूत चाहिए.....पूरी दुनिया हकीकत से वाकिफ है....लेकिन फिर भी हमारी बेबसी है....हम विश्वमंच पर अपनी सफाई दे रहे हैं....अमेरिकी हितों का ख्याल रख कर बातचीत कर रहे हैं..हमले दर हमले...एक नहीं कई बार...कभी संसद पर, तो कभी मुंबई और दिल्ली की जनता पर....लेकिन हर बार सबूत पेश करने की मजबूरी...क्या है...यह?..... अब जरा अमेरिका की तरफ देखिए.....एक हमले ने तालिबान का सफाया करने पर मजबूर कर दिया....उसे सबूत देने की जरूरत क्यों नहीं पड़ती....आतंकवाद उससे पहले भी था....लेकिन पूरी दुनिया के लिए खतरा तब बना....जब उसने अमेरिका को अपनी चपेट में लिया...हम ये क्यों नहीं सोच पाते...कि आज विश्व मंच पर भारत को नजरअंदाज कर देना...किसी के वश की बात नहीं...दुनिया की अर्थव्यवस्था चौपट हुई...तो भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती भी दुनिया के सामने आई...इतना ही नहीं.....बात चाहे सैन्य क्षमता की हो....या तकनीकी कुशलता की हमारा लोहा सभी मानते हैं....लेकिन फिर भी हम पाक और चीन की हरकतों का जवाब नहीं दे पाते....बल्कि उनकी हरकतों पर गांधीगिरी का राग आलापते हैं...शायद हमारे हुक्मरानों को इंतजार है...कि तालिबानी पाकिस्तान से एक और हमला हो....और दुनिया हमारे सब्र की दाद दे....वाह भई वाह.....आखिर हम भी तो गर्व से कहते हैं.....कि मेरा देश महान.....
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